Wednesday, July 24, 2024
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इंदौर में आपातकाल के बंदी आज भी नहीं भूले यातनाएं, बर्फ पर घंटों लेटाकर लगाते थे करंट

देश में 25 मई 1975 को लगे आपातकाल के बाद मीसाबंदी कानून के तहत जेल में रहे इंदौर रमेश गुप्ता आज भी वो दर्द याद हैं। 19 महीने तक किसी को भी जेल से बाहर नहीं भेजा गया। पूछताछ के नाम पर प्रताड़‍ित किया जाता था। एक बंदी के बच्चे की मौत पर पैरोल भी नहीं दी, बेड़ियां बांधकर श्मशान तक ले गए थे।

25 जून 1975 को अचानक आपातकाल लगाकर लोगों को जबरन जेल में डाला गया। सोते हुए लोगों को परिवार के बीच से उठाकर जबरन घसीटते हुए पुलिस ले गई। स्वजन बिलखते रहे, लेकिन पुलिस ने कोई दया नहीं दिखाई।

थानों में पूछताछ के नाम पर खूब अत्याचार किए गए। बर्फ की शिलाओं पर घंटों लिटाया जाता था। इस कारण शरीर का एक हिस्सा पूरी तरह से सुन्न हो जाता था। इससे भी मन नहीं भरने पर लोगों को उल्टा लटकाकर करंट लगाया गया।

कई लोगों के पैरों पर जूते पहनकर पुलिस वाले खड़े हो जाते थे। पैर के नाखून तक निकाल दिए। लोगों ने बगैर अपराध के नर्क की यातनाएं झेलीं, परंतु अत्याचार के विरुद्ध नहीं झुके।

मीसाबंदी कानून के तहत 19 माह जेल में रहे इंदौर में संघ के तत्कालीन शारीरिक शाखा प्रमुख रमेश गुप्ता आज भी तब की यातना नहीं भूले। उन्होंने बताया कि तब राजनेताओं, आरएसएस के पदाधिकारियों के साथ ही अन्य लोगों को जेल में डाल दिया गया था।

मीडिया पर भी प्रतिबंध था। दूसरी पंक्ति के पदाधिकारियों ने लोगों को जगाने के लिए पर्चे छपवाकर बांटे। 11 अगस्त को प्रकाशचंद सेठी इंदौर आने वाले थे और हमने पूरे शहर में पर्चे चिपका दिए। 12 अगस्त को एक साथ 22 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

थाने में पूछताछ के लिए कई साथियों के साथ बहुत बुरा बर्ताव किया गया। हमारे साथ गिरफ्तार गोविंद चौरसिया के दोनों घुटने तोड़ दिए और नाखून भी उखाड़ दिए। 19 माह में किसी को पैरोल नहीं दी गई।

शिक्षक प्रेमचंद राठौर भी मीसाबंदी में बंद थे। उनके आठ वर्षीय बालक की बालकनी से गिरने से मौत हो गई, लेकिन अंतिम संस्कार के लिए पैरोल नहीं दी। हम सभी ने भूख हड़ताल की, तब जाकर दो घंटे के लिए बेड़ियों में जकड़कर श्मशान ले गए।

वहीं से वापस जेल में लाकर डाल दिया। पत्नी ने यह विकट यातना अकेले झेली। हमारे ही एक साथी की पत्नी की भी इस दौरान मौत हो गई।

रमेश गुप्ता ने कहा कि मेरी तीन माह की बेटी का स्वास्थ्य खराब होने पर पत्नी कलेक्ट्रेट पैरोल के लिए गई, लेकिन धक्के मारकर निकाल दिया था।

मित्र और स्वजन गिरफ्तारी के डर से घर नहीं आते थे। बच्चों की पढ़ाई छूट गई। राशन के लिए परिवार परेशान रहा। माता-पिता और पत्नी ने बच्चों को बिना भोजन के सुलाया है।

मीसाबंदी के दौरान जेल में 19 माह जेल में रहे गणेश अग्रवाल बताते हैं कि मुझे साढ़े सत्रह साल की उम्र में जेल जाना पड़ा। पोस्टर चिपकाने पर मेरे साथ ओमप्रकाश वर्मा, अजय सिंह राठौर, अरविंद जैन, अरुण सोढानी की गिरफ्तारी हुई।

एक छोटे से कमरे में 40 लोगों को बंद किया था, जहां एक कोने में लघुशंका के लिए छोटा स्थान था। एक बाल्टी पानी दिया जाता था।

लघुशंका के कारण पूरी रात दुर्गंध आती थी। सोने के लिए भी पर्याप्त स्थान नहीं था। खाने में कच्ची रोटी और पानी वाली दाल दी जाती थी।

SourceNaidunia
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